बुधवार, 6 जनवरी 2010

कभी-कभी हम अपने आपको बिलकुल असहाय महसूस करते है ;अपनों के न होने के कारण नहीं बल्कि उनके अपनों जैसा न होने के कारण।
हमारी महत्ता कम न हो , बहुत बार इसलिए हम दूसरों को आत्मनिर्भर नहीं बनने देते ।
हमे देवता की दरकार तो होती है लेकिन मंदिर में ,अपने घरो में नहीं ।

सोमवार, 4 जनवरी 2010

कितनी अजीब बात है मेरे माता-पिता इस बात के लिए हद से ज्यादा सतर्क रहते है की मेरे संपर्क में कोई पुरुष [बच्चा ] न आ पाए और विशेष तौर से बिगडैल बच्चे जबकि मैंने अपने जीवन का उद्देश्य बना रखा है - भटके हुए को राह पर लाना ।
यह सही है की दूर से हमे कुछ चीजे दिखाई नहीं पड़ती लेकिन यह भी कम सच नहीं है की पास पहुच कर हम वे चीजे नहीं देख पाते जो दूर रहकर देख लेते है ।
जिन चीजो से हम जिन्दगी भर भागते है , कोई बड़ी बात नहीं यदि जिन्दगी के किसी मोड़ पर पहुच कर हम उन्ही चीजो की दुआ करने लगे ।
किसी वस्तु की कीमत उसकी जरुरत से तय होती है न की बाज़ार मूल्य से ।